गज़लुल गज़लियात3urd_irv

1मैंने रात को अपने पलंग पर उसे ढूँडा जो मेरी जान का प्यारा है;मैंने उसे ढूँडा पर न पाया।2अब मैं उठूँगी और शहर में फिरूँगी,गलियों में और बाज़ारों में, उसको ढूँडूंगी जो मेरी जान का प्यारा है।मैंने उसे ढूँडा पर न पाया।3पहरेवाले जो शहर में फिरते हैं मुझे मिले। मैंने पूछा,“क्या तुम ने उसे देखा है, जो मेरी जान का प्यारा है?”4अभी मैं उनसे थोड़ा ही आगे बढ़ी थी,कि मेरी जान का प्यारा मुझे मिल गया। मैंने उसे पकड़ रख्खा और उसे न छोड़ा;जब तक कि मैं उसे अपनी माँ के घर में और अपनी वालिदा के आरामगाह में न ले गई।
5ऐ येरूशलेम की बेटियो,मैं तुम को ग़ज़ालों और मैदान की हिरनीयों की क़सम देती हूँ कि तुम मेरे प्यारे को न जगाओ न उठाओ,जब तक कि वह उठना न चाहे।
6यह कौन है जो मुर और लुबान से और सौदागरों के तमाम 'इत्रों से मु'अत्तर होकर,बियाबान से धुंवे के खम्बे की तरह चला आता है।7देखो, यह सुलेमान की पालकी है!जिसके साथ इस्राईली बहादुरों में से साठ पहलवान हैं।8वह सब के सब शमशीरज़न और जंग में माहिर हैं।रात के ख़तरे की वजह से हर एक की तलवार उसकी रान पर लटक रही है।9सुलेमान बादशाह ने लुबनान की लकड़ियों से अपने लिए एक पालकी बनवाई।10उसके डंडे चाँदी के बनवाए,उसके बैठने की जगह सोने की और गद्दीअर्ग़वानी बनवाई;और उसके अंदर का फ़र्श, येरूशलेम की बेटियों ने इश्क से आरास्ता किया।11ऐ सिय्यून की बेटियो,बाहर निकलो और सुलेमान बादशाह को देखो;उस ताज के साथ जो उसकी माँ ने उसके शादी के दिन और उसके दिल की शादमानी के दिन उसके सिर पर रख्खा।