ज़बूर8urd_irv

1ऐ ख़ुदावन्द हमारे रब तेरा नाम तमाम ज़मीन पर कैसा बुज़ु़र्ग़ है!तूने अपना जलाल आसमान पर क़ाईम किया है।2तूने अपने मुखालिफ़ों की वजह से बच्चों और शीरख़्वारों के मुँह से कु़दरत को क़ाईम किया,ताकि तू दुश्मन और इन्तक़ाम लेने वाले को ख़ामोश कर दे।3जब मैं तेरे आसमान पर जो तेरी दस्तकारी है,और चाँद और सितारों पर जिनको तूने मुक़र्रर किया, ग़ौर करता हूँ।4तो फिर इंसान क्या है कि तू उसे याद रख्खे,और बनी आदम क्या है कि तू उसकी ख़बर ले?5क्यूँकि तूने उसे ख़ुदा से कुछ ही कमतर बनाया है,और जलाल और शौकत से उसे ताजदार करता है।6तूने उसे अपनी दस्तकारी पर इख़्तियार बख़्शा है;तूने सब कुछ उसके क़दमों के नीचे कर दिया है।7सब भेड़ — बकरियाँ,गाय — बैल बल्कि सब जंगली जानवर8हवा के परिन्दे और समन्दर कीऔर जो कुछ समन्दरों के रास्ते में चलता फिरता है।9ऐ ख़ुदावन्द, हमारे रब्ब!तेरा नाम पूरी ज़मीन पर कैसा बुज़ु़र्ग़ है!