ज़बूर39urd_irv
1मैंने कहा “मैं अपनी राह की निगरानी करूँगा,ताकि मेरी ज़बान से ख़ता न हो;जब तक शरीर मेरे सामने है,मैं अपने मुँह को लगाम दिए रहूँगा।”2मैं गूंगा बनकर ख़ामोश रहा,और नेकी की तरफ़ से भी ख़ामोशी इख़्तियार की;और मेरा ग़म बढ़ गया।3मेरा दिल अन्दर ही अन्दर जल रहा था।सोचते सोचते आग भड़क उठी,तब मैं अपनी ज़बान से कहने लगा,4“ऐ ख़ुदावन्द! ऐसा कर कि मैं अपने अंजाम से वाकिफ़ हो जाऊँ,और इससे भी कि मेरी उम्र की मी'आद क्या है;मैं जान लूँ कि कैसा फ़ानी हूँ!5देख, तूने मेरी उम्र बालिश्त भर की रख्खी है,और मेरी ज़िन्दगी तेरे सामने बे हक़ीक़त है।यक़ीनन हर इंसान बेहतरीन हालत में भी बिल्कुल बेसबात है सिलाह6दर हक़ीकत इंसान साये की तरह चलता फिरता है;यक़ीनन वह फ़जूल घबराते हैं;वह ज़ख़ीरा करता है और यह नहीं जानता के उसे कौन लेगा!7“ऐ ख़ुदावन्द! अब मैं किस बात के लिए ठहरा हूँ?मेरी उम्मीद तुझ ही से है।8मुझ को मेरी सब ख़ताओं से रिहाई दे।बेवक़ूफ़ों को मुझ पर अंगुली न उठाने दे।9मैं गूंगा बना,मैंने मुँह न खोला क्यूँकि तू ही ने यह किया है।10मुझ से अपनी बला दूर कर दे;मैं तो तेरे हाथ की मार से फ़ना हुआ जाता हूँ।11जब तू इंसान को बदी पर मलामत करके तम्बीह करता है;तो उसके हुस्न को पतंगे की तरह फ़ना कर देता है;यक़ीनन हर इंसान बेसबात है। सिलाह12“ऐ ख़ुदावन्द! मेरी दुआ सुन और मेरी फ़रियाद पर कान लगा;मेरे आँसुओं को देखकर ख़ामोश न रह!क्यूँकि मैं तेरे सामने परदेसी और मुसाफ़िर हूँ,जैसे मेरे सब बाप — दादा थे।13आह! मुझ से नज़र हटा ले ताकि ताज़ा दम हो जाऊँ,इससे पहले के मर जाऊँ और हलाक हो जाऊँ।”