ज़बूर141urd_irv
1ऐ ख़ुदावन्द! मैने तेरी दुहाई दी मेरी तरफ़ जल्द आ!जब मैं तुझ से दुआ करूँ, तो मेरी आवाज़ पर कान लगा!2मेरी दुआ तेरे सामने ख़ुशबू की तरह हो,और मेरा हाथ उठाना शाम की कु़र्बानी की तरह!3ऐ ख़ुदावन्द! मेरे मुँह पर पहरा बिठा;मेरे लबों के दरवाजे़ की निगहबानी कर।4मेरे दिल को किसी बुरी बात की तरफ़ माइल न होने दे;कि बदकारों के साथ मिलकर, शरारत के कामों में मसरूफ़ हो जाए,और मुझे उनके नफ़ीस खाने से दूर रख।5सादिक़ मुझे मारे तो मेहरबानी होगी,वह मुझे तम्बीह करे तो जैसे सिर पर रौग़न होगा।मेरा सिर इससे इंकार न करे,क्यूँकि उनकी शरारत में भी मैं दुआ करता रहूँगा।6उनके हाकिम चट्टान के किनारों पर से गिरा दिए गए हैं,और वह मेरी बातें सुनेंगे, क्यूँकि यह शीरीन हैं।7जैसे कोई हल चलाकर ज़मीन को तोड़ता है,वैसे ही हमारी हड्डियाँ पाताल के मुँह पर बिखरी पड़ी हैं।8क्यूँकि ऐ मालिक ख़ुदावन्द! मेरी आँखें तेरी तरफ़ हैं;मेरा भरोसा तुझ पर है, मेरी जान को बेकस न छोड़!9मुझे उस फंदे से जो उन्होंने मेरे लिए लगाया है,और बदकिरदारों के दाम से बचा।10शरीर आप अपने जाल में फंसें,और मैं सलामत बच निकलूँ।