अय्यूब : मैं जानता हूँ कि मेरा नजातदहिंदा ज़िंदा है
1तब अय्यूब ने जवाब में कहा,2“तुम कब तक मुझ पर तशद्दुद करना चाहते हो, कब तक मुझे अलफ़ाज़ से टुकड़े टुकड़े करना चाहते हो?3अब तुमने दस बार मुझे मलामत की है, तुमने शर्म किए बग़ैर मेरे साथ बदसुलूकी की है।4अगर यह बात सहीह भी हो कि मैं ग़लत राह पर आ गया हूँ तो मुझे ही इसका नतीजा भुगतना है।5लेकिन चूँकि तुम मुझ पर अपनी सबक़त दिखाना चाहते और मेरी रुसवाई मुझे डाँटने के लिए इस्तेमाल कर रहे हो6तो फिर जान लो, अल्लाह ने ख़ुद मुझे ग़लत राह पर लाकर अपने दाम से घेर लिया है।7गो मैं चीख़कर कहूँ, ‘मुझ पर ज़ुल्म हो रहा है,’ लेकिन जवाब कोई नहीं मिलता। गो मैं मदद के लिए पुकारूँ, लेकिन इनसाफ़ नहीं पाता।8उसने मेरे रास्ते में ऐसी दीवार खड़ी कर दी कि मैं गुज़र नहीं सकता, उसने मेरी राहों पर अंधेरा ही छा जाने दिया है।9उसने मेरी इज़्ज़त मुझसे छीनकर मेरे सर से ताज उतार दिया है।10चारों तरफ़ से उसने मुझे ढा दिया तो मैं तबाह हुआ। उसने मेरी उम्मीद को दरख़्त की तरह जड़ से उखाड़ दिया है।11उसका क़हर मेरे ख़िलाफ़ भड़क उठा है, और वह मुझे अपने दुश्मनों में शुमार करता है।12उसके दस्ते मिलकर मुझ पर हमला करने आए हैं। उन्होंने मेरी फ़सील के साथ मिट्टी का ढेर लगाया है ताकि उसमें रख़ना डालें। उन्होंने चारों तरफ़ से मेरे ख़ैमे का मुहासरा किया है।13मेरे भाइयों को उसने मुझसे दूर कर दिया, और मेरे जाननेवालों ने मेरा हुक़्क़ा-पानी बंद कर दिया है।14मेरे रिश्तेदारों ने मुझे तर्क कर दिया, मेरे क़रीबी दोस्त मुझे भूल गए हैं।15मेरे दामनगीर और नौकरानियाँ मुझे अजनबी समझते हैं। उनकी नज़र में मैं अजनबी हूँ।16मैं अपने नौकर को बुलाता हूँ तो वह जवाब नहीं देता। गो मैं अपने मुँह से उससे इल्तिजा करूँ तो भी वह नहीं आता।17मेरी बीवी मेरी जान से घिन खाती है, मेरे सगे भाई मुझे मकरूह समझते हैं।18यहाँ तक कि छोटे बच्चे भी मुझे हक़ीर जानते हैं। अगर मैं उठने की कोशिश करूँ तो वह अपना मुँह दूसरी तरफ़ फेर लेते हैं।19मेरे दिली दोस्त मुझे कराहियत की निगाह से देखते हैं, जो मुझे प्यारे थे वह मेरे मुख़ालिफ़ हो गए हैं।20मेरी जिल्द सुकड़कर मेरी हड्डियों के साथ जा लगी है। मैं मौत से बाल बाल बच गया हूँ।21मेरे दोस्तो, मुझ पर तरस खाओ, मुझ पर तरस खाओ। क्योंकि अल्लाह ही के हाथ ने मुझे मारा है।22तुम क्यों अल्लाह की तरह मेरे पीछे पड़ गए हो, क्यों मेरा गोश्त खा खाकर सेर नहीं होते?23काश मेरी बातें क़लमबंद हो जाएँ! काश वह यादगार पर कंदा की जाएँ,24लोहे की छैनी और सीसे से हमेशा के लिए पत्थर में नक़्श की जाएँ!25लेकिन मैं जानता हूँ कि मेरा छुड़ानेवाला ज़िंदा है और आख़िरकार मेरे हक़ में ज़मीन पर खड़ा हो जाएगा,26गो मेरी जिल्द यों उतारी भी गई हो। लेकिन मेरी आरज़ू है कि जिस्म में होते हुए अल्लाह को देखूँ,27कि मैं ख़ुद ही उसे देखूँ, न कि अजनबी बल्कि अपनी ही आँखों से उस पर निगाह करूँ। इस आरज़ू की शिद्दत से मेरा दिल तबाह हो रहा है।28तुम कहते हो, ‘हम कितनी सख़्ती से अय्यूब का ताक़्क़ुब करेंगे’ और ‘मसले की जड़ तो उसी में पिनहाँ है।’29लेकिन तुम्हें ख़ुद तलवार से डरना चाहिए, क्योंकि तुम्हारा ग़ुस्सा तलवार की सज़ा के लायक़ है, तुम्हें जानना चाहिए कि अदालत आनेवाली है।”