1फ़िलिस्ती अल्लाह का संदूक़ अबन-अज़र से अशदूद शहर में ले गए।2वहाँ उन्होंने उसे अपने देवता दजून के मंदिर में बुत के क़रीब रख दिया।3अगले दिन सुबह-सवेरे जब अशदूद के बाशिंदे मंदिर में दाख़िल हुए तो क्या देखते हैं कि दजून का मुजस्समा मुँह के बल रब के संदूक़ के सामने ही पड़ा है। उन्होंने दजून को उठाकर दुबारा उस की जगह पर खड़ा किया।4लेकिन अगले दिन जब सुबह-सवेरे आए तो दजून दुबारा मुँह के बल रब के संदूक़ के सामने पड़ा हुआ था। लेकिन इस मरतबा बुत का सर और हाथ टूटकर दहलीज़ पर पड़े थे। सिर्फ़ धड़ रह गया था।5यही वजह है कि आज तक दजून का कोई भी पुजारी या मेहमान अशदूद के मंदिर की दहलीज़ पर क़दम नहीं रखता।6फिर रब ने अशदूद और गिर्दो-नवाह के देहातों पर सख़्त दबाव डालकर बाशिंदों को परेशान कर दिया। उनमें अचानक अज़ियतनाक फोड़ों की वबा फैल गई।7जब अशदूद के लोगों ने इसकी वजह जान ली तो वह बोले, “लाज़िम है कि इसराईल के ख़ुदा का संदूक़ हमारे पास न रहे। क्योंकि उसका हम पर और हमारे देवता दजून पर दबाव नाक़ाबिले-बरदाश्त है।”8उन्होंने तमाम फ़िलिस्ती हुक्मरानों को इकट्ठा करके पूछा, “हम इसराईल के ख़ुदा के संदूक़ के साथ क्या करें?” उन्होंने मशवरा दिया, “उसे जात शहर में ले जाएँ।”9लेकिन जब अहद का संदूक़ जात में छोड़ा गया तो रब का दबाव उस शहर पर भी आ गया। बड़ी अफ़रा-तफ़री पैदा हुई, क्योंकि छोटों से लेकर बड़ों तक सबको अज़ियतनाक फोड़े निकल आए।10तब उन्होंने अहद का संदूक़ आगे अक़रून भेज दिया। लेकिन संदूक़ अभी पहुँचनेवाला था कि अक़रून के बाशिंदे चीख़ने लगे, “वह इसराईल के ख़ुदा का संदूक़ हमारे पास लाए हैं ताकि हमें हलाक कर दें!”11तमाम फ़िलिस्ती हुक्मरानों को दुबारा बुलाया गया, और अक़रूनियों ने तक़ाज़ा किया कि संदूक़ को शहर से दूर किया जाए। वह बोले, “इसे वहाँ वापस भेजा जाए जहाँ से आया है, वरना यह हमें बल्कि पूरी क़ौम को हलाक कर डालेगा।” क्योंकि शहर पर रब का सख़्त दबाव हावी हो गया था। मोहलक वबा के बाइस उसमें ख़ौफ़ो-हिरास की लहर दौड़ गई।12जो मरने से बचा उसे कम अज़ कम फोड़े निकल आए। चारों तरफ़ लोगों की चीख़-पुकार फ़िज़ा में बुलंद हुई।