नीतिबचन9hne_twf

बुद्धि अऊ मुरूखता के नेवता

1बुद्धि ह अपन घर बनाईस;ओह येकर सात ठन खंभा बनाय हवय।2ओह अपन पसु के मांस रांधे हवय अऊ अंगूर के मंद तियार करे हवय;अऊ खाना खाय बर अपन मेज म रखे हवय।3ओह अपन सेवकमन ला पठोय हवय,अऊ ओह सहर के सबले ऊंच जगह ले, ये कहिके बलाथे,4“जऊन मन सीधा-साधा अंय, ओमन मोर घर म आवंय!”जऊन मन निरबुद्धि अंय, ओमन ला ओह कहिथे,5“आवव, मोर खाना खाववअऊ मोर तियार करे गे अंगूर के मंद ला पीयव।6अपन सीधा-साधा रसता ला छोंड़व, त तुमन जीयत रहिहू;समझवाले रसता म चलव।”
7जऊन ह ठट्ठा करइया ला सिकछा देथे, ओकर बेजत्ती होथे;जऊन ह दुस्ट मनखे ला डांटथे, ओह गारी खाथे।8ठट्ठा करइयामन ला झन डांट, नइं तो ओमन तोर ले घिन करहीं;बुद्धिमान मनखेमन ला डांट, त ओमन तोर ले मया करहीं।9बुद्धिमान मनखे ला सिकछा दे, त ओमन अऊ बुद्धिमान होहीं;धरमीमन ला सिखा, त ओमन अपन गियान ला अऊ बढ़ाहीं।
10यहोवा के भय मनई बुद्धि के सुरूआत अय,पबितर परमेसर ला जानई समझ के बात अय।11काबरकि परमेसर के दुवारा तोर उमर बढ़ही,अऊ तोर जिनगी म अऊ बछर जोड़े जाही।12कहूं तेंह बुद्धिमान अस, त तोर बुद्धि के कारन तोला ईनाम मिलही;यदि तेंह ठट्ठा करइया अस, त सिरिप तेंहीच ह दुख भोगबे।
13मुरूखता ह एक ब्यवस्थाहीन माईलोगन सहीं अय;ओह सीधी-साधी अय अऊ कुछू नइं जानय।14ओह अपन घर के कपाट करा बईठथे;ओह सहर के सबले ऊंच जगह म आसन जमाथे15अऊ जऊन मन उहां ले होवत, अपन रसता म सीधा जावत रहिथें,ओमन ला ओह चिचियाके कहिथे,16“जऊन मन सीधा-साधा अंय, ओमन मोर घर म आवंय!”जऊन मन निरबुद्धि अंय, ओमन ला ओह कहिथे,17“चोराय पानी ह मीठ लगथे;चोरी-छुपे खाय खाना ह सुवादिस्ट होथे!”18पर ओमन नइं जानंय कि उहां मरे मनखेमन हवंय,अऊ ये घलो कि ओकर पहुनामन गहिरा, मिरतू-लोक म हवंय।