1हे मोर बेटा, मोर बुद्धि के बात ऊपर धियान लगा,अऊ मोर समझ के बात ला सुन,2ताकि तोर बिबेक ह सही रहयअऊ तोर मुहूं ले गियान के बात निकलय।3काबरकि छिनारी माईलोगन के मुहूं ले गुरतूर बात निकलथे,अऊ ओकर बात ह तेल ले घलो जादा चिकना होथे;4पर आखिर म, ओह पित्त के सहीं करू,अऊ दूधारी तलवार सहीं चोख होथे।5ओकर गोड़मन मिरतू कोति जाथें;अऊ ओकर पांवमन सीधा कबर करा ले जाथें।6ओह जिनगी के रसता के बारे म बिचार नइं करय;ओह एती-ओती भटकथे, पर ओह ये बात ला नइं जानय।7एकरसेति, हे मोर बेटामन, मोर बात ला सुनव,अऊ जऊन कुछू मेंह कहिथंव, ओला मानव।8अइसने छिनारी माईलोगन ले दूरिहा रहव,अऊ ओकर घर के लकठा म घलो झन जावव,9नइं तो तुम्हर मान-सम्मान दूसरमन करा चल दीहीअऊ निरदयी मनखे ह तुम्हर परतिस्ठा ला ले लीही।10या अजनबीमन तुम्हर संपत्ति म मजा उड़ाहींअऊ तुम्हर मेहनत ह दूसरमन ला धनवान बनाही;11अऊ अपन जिनगी के आखिरी बेरा म,जब तुम्हर देहें ह कमजोर हो जाही, त तुमन कलहरहू;12अऊ ये कहिहू, “मेंह अनुसासन म काबर नइं रहेंव,अऊ दूसर के डांट ला काबर तुछ जानेंव!13मेंह अपन गुरूमन के बात ला नइं मानेंवअऊ अपन सिखोइयामन के बात ला नइं सुनेंव।14मेंह तुरते परमेसर के मनखेमन के सभा मगंभीर समस्या म रहेंव।”15तें अपन ही जलासय,अऊ अपन ही कुआं के सोत के पानी पीये कर।16का तोर झरना के पानी गलीमन म,अऊ पानी के धारा गली के चऊकमन म बहय?17ओह सिरिप तोरेच रहय,अऊ अजनबीमन संग बांटे बर नइं।18तोर पानी के सोता आसीसित रहय,अऊ तें अपन जवानी के घरवाली संग आनंद मना।19ओह तोर बर एक मयारू हिरनी, एक सुघर सांबरनी सहीं होवय—ओकर छाती ह तोला हमेसा खुस रखय,अऊ तेंह ओकर मया म हमेसा बंधे रह।20हे मोर बेटा, आने मनखे के घरवाली के मया म तेंह काबर मोहित होबे?अऊ एक छिनार ला अपन छाती ले काबर लगाबे?21काबरकि तोर चालचलन ला यहोवा ह देखत हवय,अऊ ओह तोर जम्मो चालचलन ला परखथे।22दुस्ट मनखेमन अपनेच अधरम के काम म फंसथें;ओमन अपनेच पाप के बंधन म कसके बंधे रहिथें।23ओमन सिकछा के कमी के कारन मर जाहीं,अऊ अपनेच मुरूखता के कारन भटक जाहीं।