1याकूब न आंखी उठाय क यो देख्यो कि एसाव चार सौ आदमी ख संग लियो हुयो आय रह्यो हय। तब ओन बच्चा ख अलग अलग बाट क लिआ : राहेल अऊर दोयी दासियों ख उन्को बच्चा सौंप दियो।2अऊर ओन सब सी आगु दोयी दासियों अऊर उन्को बच्चा ख, उन्को पीछू लिआ ख ओको बच्चा को संग, अऊर सब सी पीछू राहेल अऊर यूसुफ ख खड़ो करयो,3अऊर याकूब खुद उन सब को आगु आगु गयो जब तक ऊ अपनो भाऊ को जवर नहीं पहुंच गयो, तब तक ऊ जमीन पर झुक क सात बात ओख दण्डवत करतो रह्यो।4तब एसाव ओको सी भेंट करन ख दौड़्यो, अऊर ओन याकूब ख दिल सी लगाय क, ओख गरो लगायो अऊर चुम्मा लियो; तब एसाव अऊर याकूब रोवन लग्यो।5तब एसाव न आंखी उठाय क बाईयों अऊर बच्चा ख देख्यो, अऊर याकूब सी पुच्छ्यो, “हि जो तोरो संग हंय हि कौन आय?” याकूब न कह्यो, “हि तोरो दास को बच्चा आय, जिन्ख परमेश्वर न अनुग्रह कर क् मोख दियो हय।”6तब दासियां अऊर उन्को बच्चा जवर आय क झुक क एसाव ख दण्डवत करयो;7योच तरह लिआ अऊर ओको बच्चा जवर आयो अऊर उन्न झुक क एसाव ख दण्डवत करयो; आखरी म यूसुफ अऊर राहेल न भी जवर आय क दण्डवत करयो।8तब एसाव न पुच्छ्यो, “तोरो यो बड़ो झुण्ड मोख मिल्यो, येको का मतलब हय?” याकूब न कह्यो, “हि तुम्ख मोरी भेंट हंय जेको सी तुम मोख स्वीकार कर सको।”9एसाव न कह्यो, “हे मोरो भाऊ, मोरो जवर त बहुत हय; जो कुछ तोरो हय ऊ तोरोच रहे।”10याकूब न कह्यो, “नहीं नहीं, यदि तोरो अनुग्रह मोरो पर हो, त मोरी भेंट ग्रहन कर; कहालीकि मय न तोरो दर्शन पा क, मानो परमेश्वर को दर्शन पायो हय, अऊर तय मोरो सी प्रसन्न भयो हय।11येकोलायी यो भेंट जो तोख भेजी गयी हय, ओख ग्रहन कर; कहालीकि परमेश्वर न मोरो पर अनुग्रह करयो हय, अऊर मोरो जवर बहुत हय।” जब याकूब न ओको सी बहुत आग्रह करयो, तब एसाव न भेंट ख ग्रहन करयो।12तब एसाव न कह्यो, “आव, हम अपनी रस्ता पर आगु चलबो; अऊर मय तोरो आगु आगु चलूं।”13याकूब न कह्यो, “हे मोरो स्वामी, तय त जानय हय कि मोरो बच्चा कमजोर हंय, मोरो संग दूध देन वाली शेरी मेंढियां अऊर गाय हंय; जिन्की देखभाल मोख करनो पड़य हय, यदि मय इन्क एक दिन भी ज्यादा दूर चलन लायी विवश करू हय, त सब को सब मर जायेंन।14येकोलायी मोरो स्वामी अपनो दास को आगु बढ़ जाये, अऊर मय इन जनावरों की गति को अनुसार जो मोरो आगु हंय, अऊर बच्चां की गति को अनुसार धीरू धीरू आगु चल क सेईर नगर म अपनो स्वामी को जवर पहुंचूं।”15एसाव न कह्यो, “त मय अपनो संगियों म सी कुछ ख तोरो संग छोड़ जाऊं।” तब याकूब न कह्यो, “येकी का जरूरत हय? इतनोच बहुत हय कि मोरो स्वामी की अनुग्रह की नजर मोरो पर बनी रहे।”16तब एसाव उच दिन सेईर नगर चली गयो।17पर याकूब उत सी निकल क सुक्कोतनगर ख गयो, अऊर उत अपनो लायी एक घर, अऊर जनावरों लायी कोठा बनायो। योच वजह ऊ जागा को नाम सुक्कोत पड़्यो।18याकूब पद्दनराम प्रदेश सी निकल क, कनान देश को शकेम नगर को जवर अच्छो सी पहुंच क ओन नगर को जवर तम्बू खड़ो करयो।19अऊर जो जमीन पर याकूब न तम्बू खड़ो करयो, ओख ओन शकेम को बाप हमोर को टुरावों को हाथ सी एक सौ चांदी को सिक्का म लेय लियो।20उत याकूब न एक वेदी बनाय क ओको नाम एल-एलोहे-इस्राएलरख्यो।